तसव्वुर

 

 
Akele Hasti thi

    वो तसव्वुर जो अकेले में हँसाती थी कभी, वो परी जो ख्यालों में आती थी कभी, जिसके आने से हवाएं भी महक उठती थी, वो जो चलती हुई सबा को जलाती थी कभी, जिसके हँसी ने गुलों को भी सलीका बख्शा, जो बिंदास सी लहरों को सिखाती थी कभी, सारे तारों की चमक मंद किए देती थी, वो जो पलकों को नजाकत से उठती थी कभी… अब के दुशवार है क्यूँ उसका तसव्वुर करना, जिसका चेहरा मेरे यादों को सजाती थी कभी।  

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