मेरे नाम पर मरती थी ….

कभी शर्मा के , कभी मुस्का के , आचल को सवारा करती थी ,
कभी हम पे क़यामत मरती थी, कभी हम क़यामत पे मरते थे ,

चलते चलते रुक जन, कुर्ती की सलवटों को सुल्जाना ,
भोली सूरत वाली वो ऐसे ही नज़ारा करती थी ,

मिलते ही नजर मुस्का देना और पलकों को जपका देना ,
मस्त निगाहों से अक्सर वो उही इशारा करती थी ,

जब घर से न आना होता था उस का .
तब देर तलक छत पर वो जुल्फ सवार करती थी

लोगों के सौ सौ ताने और बदनामी के अफसाने ,
मेरी खातिर न जाने वो क्या क्या गवारा करती थी….

थी वो मेरी बस मेरे नाम पर मरती थी ….
पलक …..

कभी शर्मा के , कभी मुस्का के , आचल को सवारा करती थी ,
कभी हम पे क़यामत मरती थी, कभी हम क़यामत पे मरते थे ,

चलते चलते रुक जन, कुर्ती की सलवटों को सुल्जाना ,
भोली सूरत वाली वो ऐसे ही नज़ारा करती थी ,

मिलते ही नजर मुस्का देना और पलकों को जपका देना ,
मस्त निगाहों से अक्सर वो उही इशारा करती थी ,

जब घर से न आना होता था उस का .
तब देर तलक छत पर वो जुल्फ सवार करती थी

लोगों के सौ सौ ताने और बदनामी के अफसाने ,
मेरी खातिर न जाने वो क्या क्या गवारा करती थी….

थी वो मेरी बस मेरे नाम पर मरती थी ….
पलक …..