काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता तो बड़े प्यार से बड़े चाऊ से बड़े मन के साथ तुम अपनी नाज़ुक सी कलाई मैं लगाती और फ़ुसर्सद के लम्हों मैं तुम किसी सोच मैं डूबी हाथ से घुमाती मुज को मैं तेरे हाथ की खुशबू से महक सा जाता जबकभी अनजाने से चूमा करती मुझे तेरे होंठो की नजाकत से देहेक जाता मैं रात को जब भी नीदों के सफर पर जाती अनजाने से हाथ का तकिया बनाया करती मुझे मैं तेरे कानो से लग कर कई बाते कर लेता बेफिक्री से तेरी जुल्फों को तेरे गालो को चूम लेता मुज को बेताब सा रखता तेरी चाहत का नशा हर वक्त मैं तेरी रूह मैं बसा रहता ऐसे ही तेरे हाथो मैं खनकता रहता कुछ नही तो ये बेनाम सा बंधन होता काश मैं तेरे हसीं हाथों का कंगन होता .. काश ये बंधन ऐसे ही होता … પલક … palak…

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