मगर कभी कभी …..

Hindi Poems

तू हर दिल मैं है उनकी आरजू बन कर

काश तू बनाये मुजे अपनी आरजू कभी कभी तू लगती है फूलो मैं घुली ख्श्बू की तरह काश मेरे खयालों से तू नहाये कभी कभी तू क्या है …..! तू कौन है ……! ऐ दूर के सनम …….! बताया करुगा तुजे कभी कभी मेरी जिन्दगी खुदा की नही तेरी है नेय्मत ये कहने का गुनाह भी करुगा मगर कभी कभी ……….पलक ……

खामोशियाँ

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खामोशियाँ है तो खामोश पर एक अनसुनी ज़बान में हर बात बोलती है , यह आँखें इसका साथ देती है और हर राज खोलती है , हम हर बार यह चाहतें है की किसी को सुनाई ना दे यह पर यह है की हर वक़्त मेरी तनहाइयों में चली आती है और कहती है वो बात जो दुनिया के शोर मे खो जाती है . बस खो जाती है …… palak

कभी यु तो हो …

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कभी यु भी तो हो ………. दरिया का साहिल हो , पूरे चाँद की रात हो , और तुम आओ ….! कभी यु भी तो हो ….. परियों की महफिल हो , कोई तुम्हारी बात हो , और तुम आओ …..! कभी यु भी तो हो ….. ये नर्म मुलायम ठंडी हवाएं , जब घर से तुम्हारें गुज़रे , तुम्हारी खुशबू चुरा ले मेरे घर आयें , और तुम आओ …..!   कभी यु भी तो हो …… सुनी हर मंजिल हो , कोई ना मेरे साथ हो , और तुम आओ …..! कभी यु भी तो हो …… ये बादल ऐसा टूट के बरसे , मेरे दिल की तरहा मिलने को तुम्हारा दिल भी तरसे , तुम निकालो घर से और वापिस ना जा पाओ , कभी यु भी तो हों ….. तन्हाई हो , बूंदे हो , बरसात हो और तुम आओ , और कभी वापिसना जाओ …… कभी यु भी तो हों ……… पलक …….

ज़िन्दगी

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आज मीठी धूप को अंगना से , नज़र झुकाए गुजरते देखा.. अलसाये मौसम की आँखों में , बेशुमार इश्क उमडते देखा.. पीले फूलों की क्यारियों को , प्रेम गीत, गुनगुनाते सुना.. भंवरा बेचारा भर रहा आहे,

शायद वो अकेला पड़ा …. उदासी के आलम में भि… हमने ज़िन्दगी को आज , नए रंग में पसरते देखा…… Palak

Tides Of Emotions

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रंग मैंने देखे नही… तेरी तस्वीर की बात कुछ और है… एक गूँज जो कानो मैं आज भी गूंजती है… इकरार की बात कुछ और है… जीवन का सूरज डूबे तो क्या… अंधेरे में चाँदनी की बात कुछ और है… दुःख दर्द का मुझे मालूम ना था… आँखों आसू बनके छाए हो तुम, यह बात कुछ और है… रेत पे लिखा एक नाम तो क्या… हवा की मुझसे दुश्मनी थी, यह बात कुछ और है… दिन-दहाड़े किसे ढूँढती हैं… आँखों मैं छाए हो बस तुम यह बात कुछ और है…

 

पलक

तितली जो एक मुज़ को मिली ……

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  तितली जो एक मुज़ को मिली थी किताब मैं , वो अपना अक्स छोड़ गई मेरे ख्वाब मैं , अब तक वो मेरे जेहन में उल्जा सवाल है, शामिल रही जो हर घड़ी मेरे नसीब में, आंखों में नींद है ना कोई ख्वाब दूर तक, रेहते है हम भी आज कल वैसे आजाब में, मिलता है गर्दिशों से गले लग के चाँद भी , आए थे सिमट के फासले कितने सराब में, आख़िर मेरी वफ़ा का मुझे क्या सिला मिला, लिखा ना एक हर्फ़ भी उसने जवाब मैं ..!!!… पलक…..

दूरियाँ

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कुछ दूरियाँ है हमारे तुम्हारे बीच , कुछ पलों की, कुछ ख़यालों की , कुछ बातों की , कुछ सवालों की, फिर भी हम अजनबी नही ऐसा क्यों? कुछ तो है … न जाने कुछ तो है …कुछ तो है…… पलक ….

ख्वाहिश है कुछ यु तुज से मिलु कभी

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ख्वाहिश है कुछ यु तुज से मिलु कभी मैं हो सारी दुनिया सोई ..बस जगे हो तुम और मैं फर्क क्या मुझे हो जो उस रात ना निकले चाँद दिखता हैं यु भी तेरा चेहरा चाँद मैं मुझे तुम धीरे से कुछ कहते कहते रुक जाओ और फिर रात से कहो एक पल के लिए थम जाओ वक्त भी थम जाए उस दिन सुन ने को तुम्हे फ़िर अपनी किस्मत पे क्यों ना इतराऊं मैं मैं तुम्हे बस रात भर देखती रहू तुम्हारी आँखों में हर पल और ज्यादा डूबती रहू तुम्हारे बातें सुन बज उठे है सारे एहसास उस एहसास मै रात भर क्यों ना रहू मैं और भी क्या जाने हर पल सोचती हु मैं क्यों दीवानी की तरह तुम्हे चाहती हु मैं जानती हु ये सब कभी मुमकिन नही पर फ़िर भी ख्वाहिश है कुछ यु तुजसे मिलु कभी मैं ..पलक…

एक सपना ..!!

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बालों में उलझती, खुद उलजाती …. तेरे चेहरे पे सरसराती …. मेरी उंगलिया होठों पर रुक जातीं …. कान मॆ धीमे से गुनगुनातीं ….. अधखुली अधजगी आखॊ में ….. अनगिनत सपने लिए ….. तेरे बदन की खुशबू को …. अपनी रूह में बसाती ….. कुछ सिमट-सिकुड कर ….. तेरी बाहॊ में टूट जाती …. काश ऐसा हो पाता …. तू मेरा और मैं तेरी हो पाती …. पलक ….