~~~~यादे, बस यादे ~~~~~

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कदम रुक जाते हे कई बार पलट कर जब हम बीते लम्हों को टटोलते हे, यही तो तुम खड़े थे वो कम शक्कर की चाय के कप पर वो बरसती शाम की बूंदों पर तुमने मुझे पास बुला कर कहा था की “तुम्हारे बिना जिया नही जाता” वो बूंदे गवाह थी, तुम्हारे इज़हार की वो गवाह वक्त के साथ सूख गए पर यादे….. वो वही उसी कमरे में खिड़की पर तुमसे छुट गई चाय का कप तो धुल गया पर उस मे जमी तुम्हारी खुशबू मिट नही पाई… आज भी बारिश बहुत तेज हे खुली खिड़की की आवाज़.. लगता हे तुम्हे बुला रही हे कदम रुक जाते हे कई बार पलट कर जब हम बीते लम्हों को टटोलते हे..

 

 

palak

तुज़े देख कर

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तुज़े देख कर ये मौसम भी आज मचल गया… तेरे रहते याहा किसीकी नियत का यकी करु …. इसकी आखे नही फिर भी तुज़ पर मचल गया …. मैं नाज़ुक सी जान कैसे ना तुज़ पर मरू …. आज मेरा ही इमान कर देगा मुजे बईमान …. अब तुही बता ख़ुद से क्यों ना इतना डरु……. पलक …..

Khwahish….!!!!

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ख्वाहिश है कुछ यु तुज से मिलु कभी मैं हो सारी दुनिया सोई ..बस जगे हो तुम और मैं फर्क क्या मुझे हो जो उस रात ना निकले चाँद दिखता हैं यु भी तेरा चेहरा चाँद मैं मुझे तुम धीरे से कुछ कहते कहते रुक जाओ और फिर रात से कहो एक पल के लिए थम जाओ वक्त भी थम जाए उस दिन सुन ने को तुम्हे फ़िर अपनी किस्मत पे क्यों ना इतराऊं मैं मैं तुम्हे बस रात भर देखती रहू तुम्हारी आँखों में हर पल और ज्यादा डूबती रहू तुम्हारे बातें सुन बज उठे है सारे एहसास उस एहसास मै रात भर क्यों ना रहू मैं और भी क्या जाने हर पल सोचती हु मैं क्यों दीवानी की तरह तुम्हे चाहती हु मैं जानती हु ये सब कभी मुमकिन नही पर फ़िर भी ख्वाहिश है कुछ यु तुजसे मिलु कभी मैं .. पलक…

" एक खुबसूरत याद"

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कभी आती है खामोशी से चुपके से सरगोशी से अँधेरी रात मैं भीगी बरसात मैं कभी वीराने मैं कभी अनजाने मैं कभी महफिल मैं कभी तन्हाई मैं क्या ख़बर क्यों आती है ये वक्त के किस वजह से किस के लिए किस की खातिर किस ले लिए क्या कहे ..क्या बताये ये क्या है एक एहसास है एक प्यास है फ़िर भी अच्छी लगती है अनजानी सी बेगानी सी पहचानी सी ” एक खुबसूरत याद”
palak

ओठांवर आलेले शब्द….

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ओठांवर आलेले शब्द…. ओठांवर आलेले शब्द तसेच सांडून जातात…. मी बोलतच नाही डोळ्यांत दाटलेले भाव तसेच विरून जातात…. तिला कळतच नाही तिच्याकडे पाहिलं की पाहतच राहतो… स्तब्ध होऊन तिच्याकड नाही पाहिलं की तीच निघून जाते… क्षुब्ध होऊन चंद्र तारे तोडून तिला आणून द्यायचं मनात येतं पण हे शक्य नाही हेही लगेच ध्यानात येत मग मी माझी इच्छा फुलावरच भागवतो बुकेही नाहीच परवडत हाही हिशेब आठवतो पण फुल तिला द्यायची हिम्मतच होत नाही बोलणच काय, तेव्हा तिच्या बाजुलाही फिरकत नाही मग एखाद्या जाड पुस्तकात फुल तसच सुकत जातं सगळी तयारी सगळी हिम्मत नेहमी असंच फुकट जातं काही केल्या तिच्या मनाचा थांगपत्ता लागत नाही माझं मन तिच्याशिवाय काहिसुद्धा मागत नाही ती नाही म्हणेल याची भीती वाटते ती नाही म्हणेल याची भीती वाटते पण तरीही आज ठरवलंय तिला सांगायचं तिच्यासाठी असलेलं आयुष्य तिच्याच स्वाधीन करायचं कुणास ठाऊक? तिच्याही एखाद्या पुस्तकात माझ्यासाठीची सुकलेली फुलं असतील!

इंतजार …!!!!

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शाम आ गयी अपने वक़्त से पर तुम नहीं आये? बीतने लगी है शाम फिर वक़्त से तुम अब भी नहीं आये ? रात ने भी ,अब तो, दस्तक दे दी है तुम क्यूँ नहीं आये !!

देखो ना, आज नींद ने भी तुमसे दोस्ती की है शायद कुछ जुदा सी है मुझसे आज वो भी !! कोई नहीं है पास मेरे तुम्हारे ख्यालों के सिवा मैं खुश भी हूँ और तन्हा भी …. पूछ रही है हर पहर मुझसे तुम्हारा ही फ़साना ये राहें भी जाने क्यूँ गुमसुम सी लगती है

सर उठा के चाँद से तुम्हारा हाल लिया .. हवाओं को फिर रोक के अपने दिल का संदेस दिया… जब कोई झोंका आये पास तुम्हारे … मेरे खामोश दिल की आवाज़ सुन लेना …

एक बात सुनो, तो कुछ मांगू तुमसे ! थोडी सी नींद और कुछ पल तुम्हारे ही… वक़्त मिले तो ख़्वाबों में ही मिल जाना दो बातें तुमसे फिर वहीं मैं कर लूंगी…
पलक

ek sunder ghar

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मैने देखा था स्वपन एक सुन्दर घर का, बनाते हम तुम मिल कर जो, जैसे प्रेम नीद मै,प्रेमी दो , अपना जहाँ सुन्दर होता, जिसमे हम रह पाते तो, तुम मेरे संग , मै तुम संग, दिल की बात कह पाते तो मै राह निहारती, तुमारी प्रेम पथ पर तुम काम से थक कर आते तो, मै भी थकी हरी सी, हस्ती, तुम भी कुछ मुस्काते तो, सारी पीरा तुम मुझ से, हम तुम से कह पाते तो,
उही जिन्दगी गुजरती अपने सव्प्नो के घर मैं,
जिन्दगी के एक पड़ाव पैर तुम हम मुकुराते तो..

 

पलक

 

 

 

 

भींगी पलके …..!!!!!

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जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया उमर भर दोहराएँ ऐसे कहानी दे गया उस से कुछ पा सकू ऐसे कहा उम्मीद थी ग़म भी वो शायद अनजानें महेरबानी दे गया सब हवाएँ ले गया मेरे समंदर की कोई प्यासी रहू मैं पैर इतना तो किया मेरी पलकों के किनारों को वो पानी दे गया … पलक

मेरे नाम पर मरती थी ….

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कभी शर्मा के , कभी मुस्का के , आचल को सवारा करती थी , कभी हम पे क़यामत मरती थी, कभी हम क़यामत पे मरते थे , चलते चलते रुक जन, कुर्ती की सलवटों को सुल्जाना , भोली सूरत वाली वो ऐसे ही नज़ारा करती थी , मिलते ही नजर मुस्का देना और पलकों को जपका देना , मस्त निगाहों से अक्सर वो उही इशारा करती थी , जब घर से न आना होता था उस का . तब देर तलक छत पर वो जुल्फ सवार करती थी लोगों के सौ सौ ताने और बदनामी के अफसाने , मेरी खातिर न जाने वो क्या क्या गवारा करती थी…. थी वो मेरी बस मेरे नाम पर मरती थी …. पलक …..