मगर कभी कभी …..

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तू हर दिल मैं है उनकी आरजू बन कर

काश तू बनाये मुजे अपनी आरजू कभी कभी तू लगती है फूलो मैं घुली ख्श्बू की तरह काश मेरे खयालों से तू नहाये कभी कभी तू क्या है …..! तू कौन है ……! ऐ दूर के सनम …….! बताया करुगा तुजे कभी कभी मेरी जिन्दगी खुदा की नही तेरी है नेय्मत ये कहने का गुनाह भी करुगा मगर कभी कभी ……….पलक ……

तितली जो एक मुज़ को मिली ……

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  तितली जो एक मुज़ को मिली थी किताब मैं , वो अपना अक्स छोड़ गई मेरे ख्वाब मैं , अब तक वो मेरे जेहन में उल्जा सवाल है, शामिल रही जो हर घड़ी मेरे नसीब में, आंखों में नींद है ना कोई ख्वाब दूर तक, रेहते है हम भी आज कल वैसे आजाब में, मिलता है गर्दिशों से गले लग के चाँद भी , आए थे सिमट के फासले कितने सराब में, आख़िर मेरी वफ़ा का मुझे क्या सिला मिला, लिखा ना एक हर्फ़ भी उसने जवाब मैं ..!!!… पलक…..

Hindi Poems

तुजे देखने को तरसती हैं ऑंखें
तरस – तरस कर बहुत बरसती हैं ऑंखें
बरस बरस कर जब थक जाती है ऑंखें
तुजे फ़िर देखने को तरसती है ऑंखें

…पलक

These beautiful lines r from Sweetu ..It’s really fantastic..so i publish here in blog॥ …palak…

खामोशी की आदत!!!

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मुझे इतनी भी सज़ा ना दे, मेरे प्यार की इंतहा ना ले… रुक जा ए चाँद थम जा ज़रा, दो घड़ी मुझे भी निहार ले… मैं टूट कर बिखर चली, मेरी ख़ाक को यूँ हवा ना दे…

दो बोल तुझसे सुन सकूँ कभी, मैं इंतज़ार मे सदा रही… तू चल पड़ा मुझे छोड कर, दीवार सी मैं खड़ी रही… सहम गयी हूँ बस इस बात से, कहीं मुझको तू भुला ना दे…

ये क्या किया तूने ए दिल बता, प्यार तूने क्यों किया भला… कैसे कहे अब ये मेरी ज़ुबान, इक बार तो मुझको गले लगा… ख़ामोशी की ये आदत कही, मुझे बेजुबान ही बना ना दे…

पलक

पहचान

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मेरी तुमसे और तुमसे मेरी पहचान कया है ? किस रिश्ते को दोनों दूर होकर भी निभाते है? धरती – नभ को जोड़ने वाला इक क्षितीज है चाँद -तारो को मिलाने वाला इक आसमान है मेरे-तेरे बीच बस एक मन का तार है

एक आत्मा का तार है ….

ज़िन्दगी

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आज मीठी धूप को अंगना से , नज़र झुकाए गुजरते देखा.. अलसाये मौसम की आँखों में , बेशुमार इश्क उमडते देखा.. पीले फूलों की क्यारियों को , प्रेम गीत, गुनगुनाते सुना.. भंवरा बेचारा भर रहा आहे,

शायद वो अकेला पड़ा …. उदासी के आलम में भि… हमने ज़िन्दगी को आज , नए रंग में पसरते देखा…… Palak

Ek Sapna

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dream एक सपना फिसल गया हाथों से कहके … “अलविदा” देखा था जिसे बड़े प्यार से… संजोया जिसे बड़ी चाहत से… उम्मीदों का साथी सुहाना उमंगों का था वोह सहारा अब न रहा वोह सपना न रहा वोह प्यारा अफसाना बिखर के रह गई खुशिया दिल भी दर्द से लगा तड़प ने बदल गया सारा आलम तबसे जबसे… एक सपना फिसल गया हाथों से.. कहके … “अलविदा”

प्यार की रस्म

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बैठे रहो मेरे पास ना जाओ कंही आज इन आखरी पलो का साथ तुम्हारी सांसो का एहसास जी लेने दो अपना यह प्यार फिर बिखर जायगी,इक काली रात ना छोडो मेरा हाथ कुछ पल बाद आप छुट जाएगा साथ बह जाने दो अपने ज़सबातो को फिर कौन सुनेगा, मेरे जाने के बाद ऐसे ना छुपाओ अपनी भीगी पालकी ना पौछेंगा कोई, मेरे बाद देखो उस चाँद को, वो सब जानता है कैसे हममे जुदा होते, तक रहा है जब आयेगी तुम्हे मेरी याद तुम भी ऐसे ही चाँद को तकना मैं काले अम्बर पर भागती आऊंगी हवा बन तुमसे लिपट जाउंगी अपने प्यार की रस्म मरकर भी निभाउंगी……………….

कैसे कहे की रोए है

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मेरी बेबस सी ये ज़ुबान क्या कहे तुम से, मगर बहुत रोए रात हम तुझे याद कर के…  

वो दीवानगी मेरी, और वो बेबाकपन मेरा, बस हँसते रहे हम आँखों मे आँसू भर के…  

जाने क्यों ना समझे तुम मेरे ज़ज़्बातों को, हमने तो रख दी हर ख़्वाहिश बे-लिबास कर के…  

ये पूछते है लोग, क्या हुआ है तुम्हे , क्यों जी रही हो इस तरह तुम हर रोज़ मर के…  

मगर बेबस है ज़ुबान हम क्या कहे तुमसे, कैसे कहे की रोए है तुम्हे याद कर के… पलक