ख्वाहिश है कुछ यु तुज से मिलु कभी

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ख्वाहिश है कुछ यु तुज से मिलु कभी मैं हो सारी दुनिया सोई ..बस जगे हो तुम और मैं फर्क क्या मुझे हो जो उस रात ना निकले चाँद दिखता हैं यु भी तेरा चेहरा चाँद मैं मुझे तुम धीरे से कुछ कहते कहते रुक जाओ और फिर रात से कहो एक पल के लिए थम जाओ वक्त भी थम जाए उस दिन सुन ने को तुम्हे फ़िर अपनी किस्मत पे क्यों ना इतराऊं मैं मैं तुम्हे बस रात भर देखती रहू तुम्हारी आँखों में हर पल और ज्यादा डूबती रहू तुम्हारे बातें सुन बज उठे है सारे एहसास उस एहसास मै रात भर क्यों ना रहू मैं और भी क्या जाने हर पल सोचती हु मैं क्यों दीवानी की तरह तुम्हे चाहती हु मैं जानती हु ये सब कभी मुमकिन नही पर फ़िर भी ख्वाहिश है कुछ यु तुजसे मिलु कभी मैं ..पलक…

एक सपना ..!!

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बालों में उलझती, खुद उलजाती …. तेरे चेहरे पे सरसराती …. मेरी उंगलिया होठों पर रुक जातीं …. कान मॆ धीमे से गुनगुनातीं ….. अधखुली अधजगी आखॊ में ….. अनगिनत सपने लिए ….. तेरे बदन की खुशबू को …. अपनी रूह में बसाती ….. कुछ सिमट-सिकुड कर ….. तेरी बाहॊ में टूट जाती …. काश ऐसा हो पाता …. तू मेरा और मैं तेरी हो पाती …. पलक ….

कैसे बयां करू उस लम्हे को ……

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कैसे बयां करू उस लम्हे को बस शब्दों मैं …? जैसे सुखी धरती पैर हो सावन की पहली बोछार जैसे सूरज की किरण आई हो कमरे मैं पहली बार जैसे अच् उठी हो गोरी कलाई चूडियों की जनक से जैसे दुल्हन का रूम निखर उठे कर के साजन का दीदार और कैसे बयां करू उस लम्हे को जब छुआ था तुम्हारे होठो ने मेरे ओठो को पहली बार… पलक ….

कैसे कहे की रोए है

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मेरी बेबस सी ये ज़ुबान क्या कहे तुम से, मगर बहुत रोए रात हम तुझे याद कर के…  

वो दीवानगी मेरी, और वो बेबाकपन मेरा, बस हँसते रहे हम आँखों मे आँसू भर के…  

जाने क्यों ना समझे तुम मेरे ज़ज़्बातों को, हमने तो रख दी हर ख़्वाहिश बे-लिबास कर के…  

ये पूछते है लोग, क्या हुआ है तुम्हे , क्यों जी रही हो इस तरह तुम हर रोज़ मर के…  

मगर बेबस है ज़ुबान हम क्या कहे तुमसे, कैसे कहे की रोए है तुम्हे याद कर के… पलक

खामोशी की आदत!!!

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मुझे इतनी भी सज़ा ना दे, मेरे प्यार की इंतहा ना ले… रुक जा ए चाँद थम जा ज़रा, दो घड़ी मुझे भी निहार ले… मैं टूट कर बिखर चली, मेरी ख़ाक को यूँ हवा ना दे…

दो बोल तुझसे सुन सकूँ कभी, मैं इंतज़ार मे सदा रही… तू चल पड़ा मुझे छोड कर, दीवार सी मैं खड़ी रही… सहम गयी हूँ बस इस बात से, कहीं मुझको तू भुला ना दे…

ये क्या किया तूने ए दिल बता, प्यार तूने क्यों किया भला… कैसे कहे अब ये मेरी ज़ुबान, इक बार तो मुझको गले लगा… ख़ामोशी की ये आदत कही, मुझे बेजुबान ही बना ना दे…

पलक