ये एहसास न था

palak-khwahish

कागज़ पर फिर शब्दों की कुछ लकीरें हम खिंच दिए
वो लकीरें किसकी के लिए यादों की सरहद बन जायेगी ये एहसास न था…
महसूस किया है इक ऐसा भी रिश्ता
जो नाम से आगे निकल गया
मालूम पड़ा जब लोगो को
दुनिया ने उसको कुचल दिया
वो रिश्ता धीरे धीरे से दुनिया से ओझल होने लगा
दिल में तो मगर वो तबसे ही नासूर क जैसे पलने लगा
हमारा घाव उन्हें दर्द न दे सो घाव हम अन्दर ही दबा लिए
वो घाव ही फिर हमारे जीने की वजह बन जायेगा, ये एहसास न था…

वो घाव जो दबा क रक्खा था
हम मरहम उसका बना लिए
फिर हलके हलके मलकर उसको
चद्दर के तले हम छुपा लिए
वो मरहम धीरे धीरे से, चद्दर में ऐसे घुलने लगा
वो घाव तो अक्खिर रूझ गया, चद्दर का रंग कुछ उड़ने लगा
गौर से उसको देखा तो फिर, ख़ुद ही से हम मुकर लिए
एक घाव मिटने वाला मरहम, चद्दर पर दाग सा बन जायेगा ये एहसास न था…

दिल का बोझ हल्का करने हम कलम तोह उठा दिए
वही कलम का तेज़ रुख किसीके दिल पर कटारी बन जाएगा ये एहसास न था

सपना …!!!!!!!

palak-khwahish

हर बार उँगलियों को छू के ;
हाथ से फिसलता सपना;

पास आके कोसो दूर
निकल जाने वाला सपना;
उम्मीद की हर डोर
हर बीते दिन पे
कमजोर बनने वाला सपना;

फिर भी हर नए दौर में
नई रोशनी देता सपना ..

इन आखों में सजता ये सपना;
जिंदगी को नया रूप रंग देता,
जीने के लिए एक मकसद देता,
फिर से टूटने के लिए
उभरता एक और नया सपना !!

पलक